Sunday, 15 October 2017

विश्व धरोहर फूलों की घाटी (the valley of flowers)

विश्व धरोहर फूलों की घाटी (the valley of flowers) विलुप्त होने के कगार पर ! फूलों की घाटी पर मंडरा रहा है खतरा,  250 प्रजाति के फुल हो चुके हैं विलुप्त !



जी हा हम बात कर रहे हैं वर्ड हेरिटेज फूलों की घाटी की जहाँ धीरे धीरे फुल विलुप्त हो रहे हैं हर वर्ष फूलों की प्रजाति गायब हो रही है हमेशा प्रकीर्ति प्रेमियों की पसंद रहने वाली जगह फूलों की घाटी एक जबरदस्त बीमारी से जूझ रही है , प्रकीर्ति प्रेमियों के लिए यह बहुत बुरी खबर है लेकिन 1985 से फूलों की घाटी इस बीमारी से ग्रसित है अगर ऐसा ही रहा तो बहुत जल्द फूलों की घाटी में फुल नहीं हमे सिर्फ घास मिलेगी और यहाँ आने वाला पर्यटक फूलों को देखकर उत्साहित नहीं बल्कि घास देख कर खुद को ठगा हुआ ,महसूस करेगा ,

क्या है फूलों की घाटी ....

87.5 वर्ग क्षेत्रफल मे फूलों घाटी की खोज 1931 मे प्रसिद्ध ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रैंक स्मिथ ने की थी। कॉमेट पर्वतारोहण के बाद रास्ता भटक कर वे यहां पहुंचे। यहां फूलों की सौन्दर्य देख मंत्रमुग्ध हो गये। और कुछ दिन घाटी की हसीनवादियों मे बिताये। उन्होने यहां से फूलों के सैंपल अपने साथ ले गये और वैली ऑफ़ फ्लावर नाम से किताब लिखी। जिसने पूरी दुनिया मे तहलका मचाया। तभी से घाटी को नयी पहचान मिली। प्रकृति की इस अनमोल खजाने से मारग्रेट लेगी मे अंतत प्रभावित थी। चार साल यहां बिता कर इसी प्रकृति मे विलिन हो गयी। घाटी की जैवविविधता के लिए पहचानी जाती है पुण्पावती नदी की कल-कल,झर-झर झरते झरने,फूलों की घाटी सौन्दर्य अपने आप में बहुत खुबसूरत घाटी पर अब किसी की नजर लग गयी है जिस कारन अब घाटी के दिन आने वाले समय में बहुत बुरे होने वाले हैं,

वैज्ञानिको ने क्यों जताई चिंता घाटी खत्म होने का अंदेशा ......

फूलो की घाटी में अपना ही एक फूल शूल बन गया  है। यह फूल फूलों की घाटी इतनी तेजी से फैल रहा कि पार्क प्रशासन की इसकी रोकथाम की तमाम इंतज़ामात भी बौना साबित हो रही है। हम बात कर रहे फूलों की घाटी में सफेद रंग का फूल पॉलीगोनम की। जो सम्पूर्ण फूलों की घाटी की जैवविविधता के लिये खतरा बन गया है। नासूर बने इस झाड़ीनुमा फूल ने फूलों की घाटी के सैकड़ो प्रजाति के फूलो को खत्म कर अन्य प्रजाति के फूलो के अस्तित्व खतरे के जद मे है। इस पॉलीगोनम के घाटी मे विस्तार से घाटी की जैवविविधता पर ग्रहण लग गया है। घाटी मे जिस तेजी से पांव पसार रहा है। और लगभग आधी घाटी को अपना आगोश मे ले लिया है। इन दिनों फूलों की घाटी मे जिधर नजर दौड़ाओ उधर पॉलीगोनम के सफेद फूल नजर आ रहे है। फूलो की घाटी मे जिस तेजी से पॉलीगोनम का झाड़ीनुमा फूल फूलो की घाटी मे जिस तेजी से पांव पसार रहा है। वही बेज्ञानिकों का मानना है की पोलिगोनम को नहीं रोका गया तो वो दिन दूर नही जब फूलों की घाटी सिर्फ पॉलीगोनम की घाटी बनकर रह जाएगी ,

फूलों की घाटी में 250 से अधिक प्रजाति के फुल हो गए विलुप्त ! 

1982 में फूलों की घाटी को रास्ट्रीय पार्क बनाया गया गया और वर्ष 2005 में फूलों की घाटी को विस्वा धरोहर घोषित किया गया था लेकिन घाटी में 25 वर्षों में 250 से अधिक प्रजाति लुप्त हो गयी है विश्व धरोहर फूलों की घाटी में 521 अलग अलग किस्म के फुल होते थे सभी फुल जुलाई और अगस्त इन 2 माह में यहाँ देखे जाते थे जिन्हें देखने विदेशी पर्यटको के साथ देशी पर्यटक भी आते थे लेकिन अब यहाँ 300 से भी कम किस्म के ही फुल देखने को मिल रहे हैं जिस कारन अब बेज्ञानिक भी चिंतित हैं और उनका कहना है की बहुत जल्द फूलों की घाटी विलुप्त हो जाएगी , हालाँकि पोलिगोनम को हटाने के लिए पार्क प्रसाशन द्वारा नेपालियों को लगाकर हटाने का कार्य किया जा रहा है लेकिन यह बेज्ञानिक तरीका नहीं है और उनका कहना है की इस तरह से पोलिगोनम बढेगा न की कम होगा ,

1982 तक केसे यहाँ 521 किस्म के फुल होते थे ?

वर्ष 1982 में रास्ट्रीय पार्क बनाने के बाद फूलों की घाटी में चरवाहों के जाने पर पाबन्दी लगा दी गयी चरवाहे यहाँ मई और जून में जाते थे और जून मध्य तक वापसी कर देते थे उस दौरान यहाँ मई और जून के महीने में भेड़ बकरी पोलिगोनम की घास को मई और जून में खा देते थे और जुलाई और अगस्त में यहाँ 521 किस्म फुल खिल जाते थे फूलों की लाइफ अधिक से अधिक 15 दिन की होती है 2 महीने में यहाँ 521 किस्म के फुल अपनी पूरी जिन्दगी जी लेते थे उसके बाद फिर से यहाँ पोलिगोनम होता था जो की अगली बार फिर भेड़ बकरी मई जून में साफ़ कर देती थी जिससे की यहाँ जुलाई अगस्त के महीने में फुल आसानी से खिल जाते थे लेकिन अब पार्क प्रसाशन जुलाई अगस्त में ही पोलिगोनम हटाने का कार्य कर रही है जिससे फूलों के खिलने के वक्त में ही यहाँ फूलों  से अधिक पोलिगोनम खिल रहा है जिस कारण यहाँ साल दर साल फूलो की प्रजाति ख़तम हो रही है ,

क्या है पोलिगोनम ?


पोलिगोनम एक तरह की घास वाला फुल है जो की साल डर साल फूलों की घाटी में फ़ैल रहा है और इसके कारण घाटी में हर तरफ पोलिगोनम ही दिखाई दे रहा है और बाकि के फूल पोलिगोनम के कारन जमीन के अन्दर ही दम तोड़ रहे हैं फूलों की घाटी में दुनिया के अनेकों फूल की प्रजाति पायी जाती थी लेकिन अब पोलिगोनम के कारन 250 से अधिक प्रजाति अपना अस्तित्व खो चुकी है ,

फ्रैंक स्मिथ की खोजी हुई घाटी पोलिगोनम की घाटी में तब्दील हो गयी , 


1931 में जिस फूलों की घाटी की खोज 
फ्रैंक स्मिथ ने की थी वह आज नहीं रह गयी है घाटी तो है लेकिन फूलों की नहीं घास की घाटी में सुकुड कर रह गयी है फूलों की घाटी की सची तस्वीर आज देखि जा रही है हालाँकि पर्यटक यहाँ अनेक सपने देख फूलों का दीदार करने आते हैं लेकिन अब यहाँ फुल नहीं सिर्फ पोलिगोनम की घाटी रह गयी है ,

 कमल नयन सिलोड़ी 

Monday, 28 September 2015

माता मूर्ति मेला माँ और बेटा का अद्भुत मिलन।

बद्रीनाथ में माता मूर्ति का मेला , बामन द्वादशी पर होता है माँ पुत्र का मिलन भगवान् बद्रीविशाल पैदल तिन किलोमीटर जाते है माँ से मिलने ,

नर हो या नारायण हर एक के लिये माता का स्थान सर्वोपरि होता है यह परम्परा आज से नहीं बल्कि सतुयग से निभाई जा रही है इसी का प्रत्यक्ष उदाहरण है माता मूर्ति मेला,इस मेले के तहत भगवान बद्रीविशाल जी माता मूर्ति से मिलने के लिये माता मूर्ति धाम उनके स्थान पर जाते है क्या है माता मूर्ति को लेकर पूरी परम्परा व मान्यता, आज से मंदिर के मुख्य्पुजारी रावल जी अलकनंदा नदी को पार कर सकते हैं कपाट खुलने से अभी तक रावल जी अलकनंदा नदी को पार नहीं कर सकते थे ,
वीओं1- सतयुग में सहस्त्र कवच का बरदान पाने के बाद जब दुरदंभ नाम के राक्षस ने सृष्टि पर उत्पात मचाना शुरु किया तो उसका बध करने के लिये भगवान विष्णु ने धर्म की पत्नी मूर्ति के गर्भ से नर और नारयण के रूप में जन्म लिया था और बद्रिकाश्रम क्षैत्र मे तप करने के बाद दुरदंभ नाम के राक्षस का बध किया था मान्यता है कि इस स्थान पर एक दिन का तप करने के एक हजार वर्ष के तप के बराबर फल की प्राप्ति होती है।

बामन द्वादशी के पर्व पर बद्रीनाथ धाम में सुबह की पूजा अर्चना के बाद रावल जी की उपस्थिति में उद्दव जी भगवान बद्रीविशाल के प्रतिनिधि के रूप में माता मूर्ति से मिलने बद्रीकाश्रम के बाम भाग मूर्तिधाम पहुचतें है इस दौरान हजारो की संख्या में श्रद्दालु भी इस यात्रा में शामिल होते है और ये भी मान्यता है कि आज के दिन के पश्चात रावल जी पंचशिला से बाहर  धाम में अन्यत्र भी जा सकते है

माता मूर्ति : बद्रीनाथ धाम हिन्दुओ के प्रसिद्ध धाम श्री बद्रीनाथ से तीन किलोमीटर दूर माता मूर्ति का मंदिर है । माता मूर्ति भगवान बद्रीविशाल जी की माता है । जहाँ वर्ष में एक बार बड़ा ही सुन्दर विशाल मेला लगता है । माता मूर्ति महोत्सव एक धार्मिक आयोजन है जिसमें नर-नारायण अपनी माता मूर्ति से मिलने जाते हैं अनादिकाल से चली आ रही इस धार्मिक परंपरा में देश के ही नहीं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं। इस धार्मिक आयोजन के बाद मुख्य पुजारी अलकनंदा नदी पार कर देव दर्शनी तक आ जा सकते हैं। मान्यता है कि जब नर-नारायण ने अपनी माता की श्रद्धा भाव से सेवा की तो इससे खुश होकर माता मूर्ति ने उन्हें वर मांगने को कहा। इसपर नर- नारायण ने माता मूर्ति से घर बार छोड़कर तपस्वी बनने का वरदान मांगा तो मां परेशान हो गई। लेकिन वह अपने को रोक नहीं पाई। इसलिए माता को उन्हें वचन देना ही पड़ा। जब वर्षों तक तपस्या में लीन रहने पर वे वापस नहीं आए तो माता खुद उनकी खोज में बदरीकाश्रम पहुंचीं। उनकी हालात देख वे काफी दुखी हुईं बाद में नर-नारायण के आग्रह पर माता मूर्ति ने भी माणा गांव के ठीक सामने एकांत स्थान में तपस्या शुरू कर दी तब माता ने उन्हें कहा कि तुम वर्ष में एक बार मुझसे मिलने जरूर आओगे। तब से नर- नारायण वर्ष में एक बार माता मूर्ति से मिलने यहां आते हैं ,
इस मेले के अवसर पर हर देश विदेश से आया हुआ श्रद्धालु भगवान् बद्रीविशाल की इस यात्रा में सामिल होता है और बद्रीनाथ जी के साथ हर सर्धालू माता मूर्ति के दर्शन के लिए जाता है

इस अवसर पर सुबह दस बजे से तिन बजे तक बद्रीनाथ जी का मंदिर बंद रहता है और आज के दिन भगवान् बद्रीनाथ जी माँ की गोद में ही भोग खाते हैं और वही भगवान का अभिषेक भी माता की गोद में ही होता है ,

जोशीमठ में फुलकोठ मेला शिव पार्वती का अद्धभुत मिलन।

अद्भुत आस्था परम्परा सभ्यता और संस्कृति का चतुष्कोणीय भव्य दर्शन । जोशीमठ में फुलकोठ , ब्रहम कमल के रूप में आते हैं शिव, पार्वती के रूप में माँ चंडिका अदभुत मिलन जोशीमठ के नरसिंह मंदिर और रविग्राम के चंडिका देवी मंदिर में यहाँ अर्धनारीश्वर अवतार ब्रहम कमल के रूप में मिलेंगे भगवान् शिव और माँ पार्वती यहाँ जो बुग्यालों से ब्रह्म कमल आते है उन्ही से यहाँ अर्धनारीश्वर अवतार बनाया जाता है, मंदिर में एक जगह जिसे कोठ कहा जाता है जिसमे बुग्याल से आये ब्रह्म कमल लगाये जाते हैं और प्राण प्रतिस्था कर उस कोठ और ब्रह्म कमल में अर्धनारीश्वर अवतार के रूप में ब्रहम कमल लगाये जाते हैं , यहाँ की परंपरा है जेसे ही प्राण प्रतिस्था कर भगवन को विराजमान किया जाता है वेसे ही गाव के 200 परिवारों के सभी लोग यहाँ मंदिर में दो दिनों तक घी के दिए जलाये रखते हैं इन दो दिन कोई भी गाव वाला सोता तक नहीं है मंदिर में ही चांचडी भजन कीर्तन करने में लगे होते हैं इस फुलकोठ से ही श्राद्ध पक्ष भी सुरु हो जाते हैं, इस फुल कोठ में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी रहती है ,जोशीमठ के नरसिंह मंदिर और रविग्राम में मनाया जाता है फुलकोठ इसे फुल कोठ इस लिए काहा जाता है क्योंकि इस फुल कोठ से पहले दिन दोनों गाव से दो दो लोग पैदल नंगे पैर 3500 से 4000 मीटर की ऊंचाई पर जाते हैं और अगले दिन सुबह उठते ही नहाने के बाद ब्रह्म कमल बुग्यालों से निकाल के अपनी कनडियों में भरते हैं तत्पस्च्यात कनडीयां भर जाने के बाद ये लोग वापस अपने अपने गावं के लिए निकलते हैं जिस दिन ये लोग वापसी करते हैं उस दिन ये लोग सारे रास्ते भर कुछ भी नहीं खाते शाम को 9 बजे के आस पास ये लोग जोशीमठ अपने गाव पहुचते हैं, और जो ब्रह्म कमल का फुल ये लोग ले के आते हैं उन्हें मंदिर के कोठ में लगाया जाता है इसीलिए इसे फुल कोठ कहा जाता है

Friday, 3 July 2015

सरस्वती नदी विलुप्त हो जाती है अलकापुरी माणा में ,

             सरस्वती नदी विलुप्त हो जाती है अलकापुरी माणा में ,

सरस्वती नदी तिब्बत के सरस्वती सरोवर से निकलती है बद्रीनाथ से आगे माणा गावँ के भीम पुल के पास दिखाई देती है और यहाँ से कुछ ही दुरी पर निकलकर माणा गावँ में ही अलकापुरी में मिलती और यहाँ से विलुप्त हो जाती है जिसके बाद कहा जाता है की पर्यागराज इलाहबाद में निकलती है और सरस्वती का विलुप्त होने का कारन बेदव्यास जी महाभारत की रचना कर रहे थे व्यास गुफा जो की माणा गावँ के ऊपर है पर सरस्वती नदी का सोर बहुत ज्यादा था जिस कारन सरस्वती नदी को बेदव्यास जी ने श्राप दिया था तब से सरस्वती नदी विलुप्त हुई है ।

कमल नयन सिलोडि 

Saturday, 20 June 2015

बद्रीनाथ यात्रा एक अद्भुत एहसास

 बद्रीनाथ की यात्रा एक अद्भुत एहसास कराती है ,

बद्रीनाथ यात्रा  जोशीमठ के बाद सुगम होती है पर बहुत ही आनंदित यात्रा, मन को शांति सुकून मिलता है , गोबिन्द्घाट पांडूकेस्वर तक यात्रा बाजारों की रोनक बहुत ही उत्साह देती है,  जेसे हनुमान चट्टी से आगे बढ़ो तो आगे यात्रा में लगता है की मार्ग थोडा कठिन जरुर है पर बनाने वाले ने की खूबसूरती से इन जगहों के पहाड़ों को सजाया है, कल कल बहते झरने कल कल नदी की आवाजे ऐसी घुन्ज्ती हैं जेसे मनो यहाँ कोइ वासिन्दा तक नहीं रहता यहाँ की आबो हवा से आने के बाद अचानक इन रास्तों से गुजतरे हुए प्रकीर्ति का आवास होता है तब ये एहसास होता की वाकई में जिसे स्वर्ग कहते हैं देखा तो हमने भी नहीं है पर सिर्फ सुना हुआ है यहाँ आने से लगता है की वाकई में कही स्वर्ग है और यही है ,
 पहली बार आये हुए लोग जगह जगह बर्फ की बड़ी बड़ी चट्टानें देख किनारे गाड़ियों को रोके हुए और उस बर्फ की चट्टान के पास जाकर फोटो खिंच रहे हैं तो कोई बर्फ को हाथ से छु रहा है और किसी किसी को हाथ एक दम से अन्दर डालते हुए देखा तो पता लगा की उन्हें बर्फ पकडे हुए काफी टाइम हो गया और अब हाथ ठन्डे हो गए धीरे धीरे बद्रीनाथ की ओर बढे तो देखा की मार्ग पूरा पहाड़ी पर है पूरी सड़क चट्टान काट कर बनी हुई है आगे और चढ़ाई पर हमको जाना है जेसे जेसे हम लोग चढ़ाई पार किये तो एक स्थान आता है देवदर्शनी जहाँ से बद्रीनाथ सुरु हो जाता है और मंदिर बिलकुल ही साफ दिखाई देता है हालाँकि जरा दुरी होने के कारन इतना भी नहीं पर भक्तों को तो मंदिर के ही दर्शन बहुत हैं वहां से पूरी बद्रीपूरी दिखाई देती है गाड़ी से उस स्थान पर उतरो और हर तरफ नजर घुमाओ तो एक अलग सा एहसास होता है ठंडी ठंडी हवाएं चलती रहती हैं बद्रीनाथ में हवाएं बहुत ज्यादा चलती है फिर वहां से आगे आयें बद्रीनाथ के बाज़ार सजा हुआ रहता है धीरे धीरे निचे मंदिर की तरफ बढे बहुत ही सुन्दर सजा हुआ बाजार मिलता है आगे पुल पार कर निचे तप्त कुंड की तरफ बढे थोड़ी ठण्ड थी वो भी हमारी तप्तकुंड में नहाने से दूर हो गयी एकदम गर्म पानी बहुत ही जरुरी और उस स्थान पर फिर मंदिर दर्शन के लिए आदिकेदार के दर्शन किये फिर वहां से आगे बढ़ हम लोग मंदिर के अच्छे से दर्शन करने के बाद परिक्रमा कर बाहर निकलते हैं 

 बद्रीनाथ मंदिर के बहार जो प्रान्गड़ है हर कोई यहाँ पर आ कर फिर से बद्रीनाथ के मंदिर को निहारता है तो कोई अपनी फोटो यहाँ पर खींचता रहता है हर कोई यहाँ की यादों को संजोना चाहता है पर मंदिर प्रान्गड़ में भीड़ देख हम भी बढे आगे प्रान्गड़ की ओर तो देखा की वहां पर भजन कीर्तन हो रहा है जिसमे सभी यात्री यहाँ बेठे हुए कुछ नाच भी रहे हैं इन्हें देख हर कोई नाचने लग जायेगा हमारा भी बहुत मन किया इस भजन कीर्तन में मंदिर के भी सभी अधिकारी और सभी लोग भी मौजूद होते है और यात्रियों के नाचते गाते जय जय नारायण गाते रहते हैं रोजाना यहाँ ऐसा होता है बस रोज यात्री बदल जाते हैं जो लोग रोज बद्रीनाथ में रहते हैं उनका जीवन बहुत ही शांति पूर्ण रहता है यही धाम है जहाँ से स्वर्ग को जाते हैं यही से पितरों को मोक्ष मिलता है नारायण के धाम बद्रीनाथ से कमल नयन सिलोड़ी

Thursday, 18 June 2015

नंदा देवी एक्सपीडिशन

यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित  नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क में अगले चौबीस  दिनों तक वैज्ञानिको व अधिकारियों द्वारा विभिन्न पादपो व जानवरों की स्थिति के बारे में जानकारियां जुटाई जाएँगी. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत  सरकार व वन विकास निगम उत्तराखंड के संयुक्त तत्वाधान में शुरू हुए नन्दा देवी डिकेडल एक्सपीडिशन 2015 के दल कों उत्तराखंड के वन मंत्री दिनेश अग्रवाल ने हरी झंडी दिखा कर जोशीमठ से रवाना किया.दल का मकसद अगले चौबीस दिनों तक नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क में जैव विविधताओं का अध्ययन कर पार्क की वर्तमान स्थिति को जानना है.
ज्ञात हो कि नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क में 1982 में चार हजार से भी अधिक पर्यटक व ट्रेकर्स पहुंचे थे, बढती पर्यटन गतिविधियों व मानव दखल के कारण नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क में प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगा था जिस कारण सरकार द्वारा 1983 में पार्क में सभी गतिविधियाँ बंद करवा दी गई थी. इसके बाद 1993 से हर दस साल में नन्दा देवी डिकेडल एक्सपीडिशन शुरू किया गया जिसके द्वारा नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क की स्थिति में हुए सुधारो का अध्ययन किया जाने लगा.मानव गतिविधियाँ कम होने से नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क की स्थिति में अनुकूल प्रभाव पड़ा व पार्क में न सिर्फ जैव विविधता बल्कि जंतुओं की स्थिति भी ठीक हुई.वर्ष 2013 में होने वाले नन्दा देवी डिकेडल एक्सपीडिशन को आपदा के कारण स्थगित करना पड़ा व इस वर्ष यह एक्सपीडिशन आयोजित किया गया है.
इस वर्ष नन्दा देवी डिकेडल एक्सपीडिशन के लिए गए दल में विभिन्न संस्थानों के 38 वैज्ञानिक व अधिकारी शामिल हैं. उत्तराखंड के वन मंत्री दिनेश अग्रवाल का कहना  है कि इस साल के एक्सपीडिशन से नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क में कई सुधार  दिखने की प्रबल संभावनाएं है और अगर सुधार अपेक्षित रहे तो यह क्षेत्र में पर्यटन की संभावनाओं को एक नयी गति देगा.
कमल नयन ।